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Friday, 2 February 2018
Thursday, 1 February 2018
ધોરણ-12 આંકડાશાસ્ત્ર ના સુત્રો
ધોરણ-12 આંકડાશાસ્ત્ર ના સુત્રો
મિત્રો
અહિ ધોરણ-12 કોમર્સ ના આંકડાશાસ્ત્ર વિષયમાં આવતા તમામ ઉપયોગી સુત્રો ની એક ફાઈલ બનાવવામાં આવી છે.જે વિદ્યાર્થીઓ અને શિક્ષક મિત્રો ને ઘણી ઉપયોગી થશે.
આ ફાઈલ PDF સ્વરૂપ માં છે
આ ફાઈલ માં પ્રકરણ મુજબ સુત્રો મુકવામાં આવેલ છે
ફાઈલ બનાવનાર -શ્રી અશોકભાઈ પ્રજાપતિ
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राजकुमारी अमृत कौर (जन्म- 2 फ़रवरी, 1889, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 2 अक्टूबर, 1964)
राजकुमारी अमृत कौर

पूरा नाम
राजकुमारी अमृत कौर
जन्म
2 फ़रवरी, 1889
जन्म भूमि
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मृत्यु
2 अक्टूबर, 1964
अभिभावक
राजा हरनाम सिंह और रानी हरनाम
पति/पत्नी
अविवाहित
नागरिकता
भारतीय
प्रसिद्धि
स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता
जेल यात्रा
वर्ष 1930 में 'दांडी मार्च' के समय राजकुमारी अमृतकौर ने गाँधीजी के साथ यात्रा की और जेल की सजा भी काटी।
विशेष योगदान
1927 में 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' की स्थापना की। नई दिल्लीमें 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में भी इनका प्रमुख योगदान था।
अन्य जानकारी
आप भारत की प्रथम महिला थीं, जो केंद्रीय मंत्री बनी थीं। 1950 में इन्हें 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' का अध्यक्ष बनाया गया था। यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली एशियायी महिला थीं।
राजकुमारी अमृत कौर (अंग्रेज़ी: Rajkumari Amrit Kaur; जन्म- 2 फ़रवरी, 1889, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 2 अक्टूबर, 1964) भारत की एक प्रख्यात गांधीवादी, स्वतंत्रता सेनानी और एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। वह देश की स्वतंत्रता के बाद भारतीय मंत्रिमण्डल में दस साल तक स्वास्थ्य मंत्री रहीं। देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री होने का सम्मान उन्हें प्राप्त है। राजकुमारी अमृत कौर कपूरथलाके शाही परिवार से ताल्लुक रखती थीं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के प्रभाव में आने के बाद ही उन्होंने भौतिक जीवन की सभी सुख-सुविधाओं को छोड़ दिया और तपस्वी का जीवन अपना लिया। वे सन 1957 से 1964 में अपने निधन तक राज्य सभा की सदस्य भी रही थीं।
जन्म तथा परिवार
राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फ़रवरी, 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता राजा हरनाम सिंह कपूरथला, पंजाब के राजा थे और माता रानी हरनाम सिंह थीं। राजा हरनाम सिंह की आठ संतानें थीं, जिनमें राजकुमारी अमृत कौर अपने सात भाईयों में अकेली बहिन थीं। अमृत कौर के पिता ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। सरकार ने उन्हें अवध की रियासतों का मैनेजर बनाकर अवध भेजा था।[1]
शिक्षा
राजकुमारी अमृत कौर की आरम्भ से लेकर आगे तक की शिक्षा इंग्लैण्ड में हुई थी। उनके पिता के गोपाल कृष्ण गोखलेसे बहुत ही अच्छे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। इस परिचय का प्रभाव राजकुमारी अमृत कौर पर भी पड़ा था। वे देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगी थीं।
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
शीघ्र ही अमृत कौर का सम्पर्क राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से हुआ। यह सम्पर्क अंत तक बना रहा। उन्होंने 16 वर्षों तक गाँधीजी के सचिव का भी काम किया। गाँधीजी के नेतृत्व में सन 1930 में जब 'दांडी मार्च' की शुरआत हुई, तब राजकुमारी अमृतकौर ने उनके साथ यात्रा की और जेल की सजा भी काटी। वर्ष 1934 से वह गाँधीजी के आश्रम में ही रहने लगीं। उन्हें 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान भी जेल हुई।
अमृत कौर 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' की प्रतिनिधि के तौर पर सन 1937 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के बन्नू गई। ब्रिटिश सरकार को यह बात नागवार गुजरी और उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया। उन्होंने सभी को मताधिकार दिए जाने की भी वकालत की और भारतीय मताधिकार और संवैधानिक सुधार के लिए गठित 'लोथियन समिति' तथा ब्रिटिश पार्लियामेंट की संवैधानिक सुधारों के लिए बनी संयुक्त चयन समिति के सामने भी अपना पक्ष रखा।
पहली महिला कैबिनेट मंत्री
राजकुमारी अमृत कौर पहली भारतीय महिला थीं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री बनने का मौका मिला था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित पहले मंत्रिमंडल में वे शामिल थीं। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यभार 1957 तक सँभाला। 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही थी।[2]
राजनीतिक सफर
अपने राजनीतिक कैरियर के दौरान राजकुमारी अमृता कौर ने कई बड़े पदों को सुशोभित किया। स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय रहीं। 1950 में उन्हें 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' का अध्यक्ष बनाया गया। यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली महिला और एशियायी थीं। डब्ल्यूएचओ के पहले पच्चीस वर्षों में सिर्फ दो महिलाएँ इस पद पर नियुक्त की गई थीं। नई दिल्ली में 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। वह इसकी पहली अध्यक्ष भी बनायी गयीं। इस संस्थान की स्थापना के लिए उन्होंने न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम जर्मनी, स्वीडन और अमरीका से मदद हासिल की थी। उन्होंने और उनके एक भाई ने शिमला में अपनी पैतृक सम्पत्ति और मकान को संस्थान के कर्मचारियों और नर्सों के लिए "होलिडे होम" के रूप में दान कर दिया था।
कल्याणकारी कार्य
राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं और हरिजनों के उद्धार के लिए भी कई कल्याणकारी कार्य किए। वह बाल विवाहऔर पर्दा प्रथा के सख्त ख़िलाफ़ थीं और इन्हें लड़कियों की शिक्षा में बडी बाधा मानती थीं। उनका कहना था कि शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर ही 1927 में 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' की स्थापना की। वह 1930 में इसकी सचिव और 1933 में अध्यक्ष बनीं। उन्होंने 'ऑल इंडिया वूमेन्स एजुकेशन फंड एसोसिएशन' के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया और नई दिल्ली के 'लेडी इर्विन कॉलेज' की कार्यकारी समिति की सदस्य रहीं। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'शिक्षा सलाहकार बोर्ड' का सदस्य भी बनाया, जिससे उन्होंने 'भारत छोडो आंदोलन' के दौरान इस्तीफा दे दिया था। उन्हें 1945 में लंदन और 1946 में पेरिस के यूनेस्को सम्मेलन में भारतीय सदस्य के रूप में भेजा गया था। वह 'अखिल भारतीय बुनकर संघ' के न्यासी बोर्ड की सदस्य भी रहीं।
निधन
2 अक्टूबर, 1964 को राजकुमारी अमृत कौर का निधन हुआ। अमृत कौर बाल विवाह और महिलाओं की अशिक्षा को दूर करने पर निरंतर ज़ोर देती रही थीं। उन्होंने विवाह नहीं किया था। अपनी सोच और संकल्प से उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में जो बुनियाद रखी, उन्हीं पर आज़ाद भारत के सपनों की ताबीर हुई थी।
पूरा नाम
राजकुमारी अमृत कौर
जन्म
2 फ़रवरी, 1889
जन्म भूमि
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मृत्यु
2 अक्टूबर, 1964
अभिभावक
राजा हरनाम सिंह और रानी हरनाम
पति/पत्नी
अविवाहित
नागरिकता
भारतीय
प्रसिद्धि
स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता
जेल यात्रा
वर्ष 1930 में 'दांडी मार्च' के समय राजकुमारी अमृतकौर ने गाँधीजी के साथ यात्रा की और जेल की सजा भी काटी।
विशेष योगदान
1927 में 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' की स्थापना की। नई दिल्लीमें 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में भी इनका प्रमुख योगदान था।
अन्य जानकारी
आप भारत की प्रथम महिला थीं, जो केंद्रीय मंत्री बनी थीं। 1950 में इन्हें 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' का अध्यक्ष बनाया गया था। यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली एशियायी महिला थीं।
राजकुमारी अमृत कौर (अंग्रेज़ी: Rajkumari Amrit Kaur; जन्म- 2 फ़रवरी, 1889, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 2 अक्टूबर, 1964) भारत की एक प्रख्यात गांधीवादी, स्वतंत्रता सेनानी और एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। वह देश की स्वतंत्रता के बाद भारतीय मंत्रिमण्डल में दस साल तक स्वास्थ्य मंत्री रहीं। देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री होने का सम्मान उन्हें प्राप्त है। राजकुमारी अमृत कौर कपूरथलाके शाही परिवार से ताल्लुक रखती थीं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के प्रभाव में आने के बाद ही उन्होंने भौतिक जीवन की सभी सुख-सुविधाओं को छोड़ दिया और तपस्वी का जीवन अपना लिया। वे सन 1957 से 1964 में अपने निधन तक राज्य सभा की सदस्य भी रही थीं।
जन्म तथा परिवार
राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फ़रवरी, 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता राजा हरनाम सिंह कपूरथला, पंजाब के राजा थे और माता रानी हरनाम सिंह थीं। राजा हरनाम सिंह की आठ संतानें थीं, जिनमें राजकुमारी अमृत कौर अपने सात भाईयों में अकेली बहिन थीं। अमृत कौर के पिता ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। सरकार ने उन्हें अवध की रियासतों का मैनेजर बनाकर अवध भेजा था।[1]
शिक्षा
राजकुमारी अमृत कौर की आरम्भ से लेकर आगे तक की शिक्षा इंग्लैण्ड में हुई थी। उनके पिता के गोपाल कृष्ण गोखलेसे बहुत ही अच्छे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। इस परिचय का प्रभाव राजकुमारी अमृत कौर पर भी पड़ा था। वे देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगी थीं।
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
शीघ्र ही अमृत कौर का सम्पर्क राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से हुआ। यह सम्पर्क अंत तक बना रहा। उन्होंने 16 वर्षों तक गाँधीजी के सचिव का भी काम किया। गाँधीजी के नेतृत्व में सन 1930 में जब 'दांडी मार्च' की शुरआत हुई, तब राजकुमारी अमृतकौर ने उनके साथ यात्रा की और जेल की सजा भी काटी। वर्ष 1934 से वह गाँधीजी के आश्रम में ही रहने लगीं। उन्हें 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान भी जेल हुई।
अमृत कौर 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' की प्रतिनिधि के तौर पर सन 1937 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के बन्नू गई। ब्रिटिश सरकार को यह बात नागवार गुजरी और उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया। उन्होंने सभी को मताधिकार दिए जाने की भी वकालत की और भारतीय मताधिकार और संवैधानिक सुधार के लिए गठित 'लोथियन समिति' तथा ब्रिटिश पार्लियामेंट की संवैधानिक सुधारों के लिए बनी संयुक्त चयन समिति के सामने भी अपना पक्ष रखा।
पहली महिला कैबिनेट मंत्री
राजकुमारी अमृत कौर पहली भारतीय महिला थीं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री बनने का मौका मिला था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित पहले मंत्रिमंडल में वे शामिल थीं। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यभार 1957 तक सँभाला। 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही थी।[2]
राजनीतिक सफर
अपने राजनीतिक कैरियर के दौरान राजकुमारी अमृता कौर ने कई बड़े पदों को सुशोभित किया। स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय रहीं। 1950 में उन्हें 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' का अध्यक्ष बनाया गया। यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली महिला और एशियायी थीं। डब्ल्यूएचओ के पहले पच्चीस वर्षों में सिर्फ दो महिलाएँ इस पद पर नियुक्त की गई थीं। नई दिल्ली में 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' की स्थापना में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। वह इसकी पहली अध्यक्ष भी बनायी गयीं। इस संस्थान की स्थापना के लिए उन्होंने न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम जर्मनी, स्वीडन और अमरीका से मदद हासिल की थी। उन्होंने और उनके एक भाई ने शिमला में अपनी पैतृक सम्पत्ति और मकान को संस्थान के कर्मचारियों और नर्सों के लिए "होलिडे होम" के रूप में दान कर दिया था।
कल्याणकारी कार्य
राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं और हरिजनों के उद्धार के लिए भी कई कल्याणकारी कार्य किए। वह बाल विवाहऔर पर्दा प्रथा के सख्त ख़िलाफ़ थीं और इन्हें लड़कियों की शिक्षा में बडी बाधा मानती थीं। उनका कहना था कि शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर ही 1927 में 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' की स्थापना की। वह 1930 में इसकी सचिव और 1933 में अध्यक्ष बनीं। उन्होंने 'ऑल इंडिया वूमेन्स एजुकेशन फंड एसोसिएशन' के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया और नई दिल्ली के 'लेडी इर्विन कॉलेज' की कार्यकारी समिति की सदस्य रहीं। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'शिक्षा सलाहकार बोर्ड' का सदस्य भी बनाया, जिससे उन्होंने 'भारत छोडो आंदोलन' के दौरान इस्तीफा दे दिया था। उन्हें 1945 में लंदन और 1946 में पेरिस के यूनेस्को सम्मेलन में भारतीय सदस्य के रूप में भेजा गया था। वह 'अखिल भारतीय बुनकर संघ' के न्यासी बोर्ड की सदस्य भी रहीं।
निधन
2 अक्टूबर, 1964 को राजकुमारी अमृत कौर का निधन हुआ। अमृत कौर बाल विवाह और महिलाओं की अशिक्षा को दूर करने पर निरंतर ज़ोर देती रही थीं। उन्होंने विवाह नहीं किया था। अपनी सोच और संकल्प से उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में जो बुनियाद रखी, उन्हीं पर आज़ाद भारत के सपनों की ताबीर हुई थी।
मगन भाई देसाई (जन्म- 11 अक्टूबर, 1889, खेड़ा ज़िला, गुजरात; मृत्यु- 1 फ़रवरी, 1969)
मगन भाई देसाई
| |
| पूरा नाम | मगन भाई देसाई |
| जन्म | 11 अक्टूबर, 1889 |
| जन्म भूमि | खेड़ा ज़िला, गुजरात |
| मृत्यु | 1 फ़रवरी, 1969 |
| कर्म भूमि | गुजरात |
| भाषा | गुजराती |
| प्रसिद्धि | गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति। |
| नागरिकता | भारतीय |
| संबंधित लेख | गांधी जी |
| अन्य जानकारी | मगन भाई देसाई ने गुजराती भाषा में अनेक मौलिक पुस्तकों की रचना की तथा उपनिषदों पर भाष्य लिखे। |
| इन्हें भी देखें | कवि सूची, साहित्यकार सूची |
मगन भाई देसाई (अंग्रेज़ी: Magan Bhai Desai, जन्म- 11 अक्टूबर, 1889, खेड़ा ज़िला, गुजरात; मृत्यु- 1 फ़रवरी, 1969) प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक और शिक्षाविद थे। ये गुजराती भाषा के लेखक भी थे। स्वतंत्रता के बाद अवसर आने पर मगन भाई देसाई कांग्रेस सरकार की नीतियों की आलोचना करने में भी पीछे नहीं रहते थे।[1]
जन्म एवं परिचय
मगन भाई देसाई का जन्म 11 अक्टूबर, 1899 ई. को गुजरात के खेड़ा ज़िले में हुआ था। वे मुबंई में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे कि 1921 में गांधी जी का भाषण सुना और उससे प्रभावित होकर विद्यालय छोड़ दिया। बाद में गुजरात विद्यापीठ में गणित के अध्यापक और रजिस्ट्रार के रूप में काम करने लगे। मगन भाई देसाई स्पष्टवादी व्यक्ति थे।
गांधी जी के अनुयायी
1932 के आंदोलन में मगन भाई देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया था। गांधी जी के कहने पर वे वर्धा के महिला महाविद्यालय के प्रभारी रहे। बाद में लगभग 24 वर्ष मगन भाई देसाई ने गुजरात विद्यापीठ की सेवा को समर्पित किए। 1957 में उन्हें गुजरात विश्वविद्यालय का उपकुलपति बनाया गया। मगन भाई देसाई का खादी, हिंदी, मद्यनिषेध, सर्वोदय, प्रौढ़ शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और गांधी वांङ्मय आदि से संबंधित प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर की 30 से अधिक समितियों से संबंध था। उन्होंने अपने विश्वास और निर्भीकता से कभी समझौता नहीं किया।
लेखक
मगन भाई देसाई अच्छे लेखक थे। उन्होंने गुजराती भाषा में अनेक मौलिक पुस्तकों की रचना की तथा उपनिषदों पर भाष्य लिखे।
निधन
कल्पना चावला (जन्म- 17 मार्च, 1962; मृत्यु- 1 फ़रवरी, 2003)
कल्पना चावला
| |
| पूरा नाम | कल्पना चावला |
| जन्म | 17 मार्च, 1962 |
| जन्म भूमि | करनाल, हरियाणा |
| मृत्यु | 1 फ़रवरी, 2003 |
| मृत्यु स्थान | टेक्सास, अमेरिका |
| अभिभावक | बनारसी लाल चावला और संज्योती |
| कर्म भूमि | भारत, अमेरिका |
| कर्म-क्षेत्र | अंतरिक्ष यात्री |
| शिक्षा | एम. ए. (एरोस्पेस इंजीनियरिंग), पी.एच.डी |
| विद्यालय | टेक्सास विश्वविद्यालय, कोलोरेडो विश्वविद्यालय |
| पुरस्कार-उपाधि | काँग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान, नासा विशिष्ट सेवा पदक |
| नागरिकता | भारतीय, अमेरिकी |
कल्पना चावला (अंग्रेज़ी: Kalpana Chawla, जन्म- 17 मार्च, 1962; मृत्यु- 1 फ़रवरी, 2003) एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।
जीवन परिचय
कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च, 1962 ई. को हरियाणा के करनाल क़स्बे में हुआ था। कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय (बाद में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी) महिला थीं। कल्पना के पिता का नाम 'श्री बनारसी लाल चावला' और माता का नाम 'संज्योती' था। वह अपने परिवार के चार भाई बहनों मे सबसे छोटी थी।
शिक्षा
कल्पना चावला ने 1976 में करनाल के 'टैगोर स्कूल' से स्नातक, 1982 में चंडीगढ़ से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग तथा 1984 में टेक्सास विश्वविद्यालय से एरोस्पेस इंजीनियरिंग में एम. ए. किया। उन्होंने 1988 में कोलोरेडो विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी की डिग्री प्राप्त की। इसी वर्ष कल्पना ने नासा के एम्स रिसर्च सेंटर में काम करना शुरू किया। 1994 में उनका चयन बतौर अंतरिक्ष-यात्री किया गया। उन्होंने फ़्रांसीसी व्यक्ति जीन पियर से शादी की थी।
अंतरिक्ष उड़ान
कल्पना की पहली अंतरिक्ष उड़ान एस. टी. एस.-87 कोलंबिया स्पेस शटल से संपन्न हुई तथा इसकी अवधि 19 नवंबर से 5 दिसंबर, 1997 थी। कल्पना की दूसरी और अंतिम उड़ान 16 जनवरी, 2003 को 'कोलंबिया स्पेस शटल' से ही आरंभ हुई। यह 16 दिन का मिशन था। उन्होंने अपने सहयोगियों सहित लगभग 80 परीक्षण और प्रयोग किए। वापसी के समय 1 फरवरी2003, को शटल दुर्घटना ग्रस्त हो गई तथा कल्पना समेत 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई।
पुरस्कार
कल्पना चावला को मरणोपरांत: निम्न पुरस्कार मिले-
- काँग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान
- नासा अंतरिक्ष उड़ान पदक
- नासा विशिष्ट सेवा पदक
- प्रतिरक्षा विशिष्ट सेवा पदक
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