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Saturday, 24 March 2018

विश्व क्षयरोग दिवस / विश्व तपेदिक दिवस / विश्व टीबी दिवस (अंग्रेज़ी: World Tuberculosis Day) प्रत्येक वर्ष 24 मार्च

विश्व क्षयरोग दिवस
विश्व क्षयरोग दिवस
विवरणविश्व क्षय रोग दिवस के माध्यम से टी.बी. जैसी समस्या के विषय में और इससे बचने के उपायों के विषय में बात करने में मदद मिलती है।
तिथि24 मार्च
उद्देश्यलोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और क्षय रोग की रोकथाम के लिए कदम उठाना।
संबंधित लेखतपेदिक, विश्व एड्स दिवस, विश्व कैंसर दिवस, विश्व मधुमेह दिवस, विश्व स्वास्थ्य दिवस, विश्व हृदय दिवस
अन्य जानकारीभारत में टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरूआती दौर में गंभीरता से ना लेना।
अद्यतन‎
विश्व क्षयरोग दिवस / विश्व तपेदिक दिवस / विश्व टीबी दिवस (अंग्रेज़ी: World Tuberculosis Day) प्रत्येक वर्ष 24 मार्च को मनाया जाता है। टी.बी. का पूरा नाम है ट्यूबरकुल बेसिलाई। यह एक छूत का रोग है और इसे प्रारंभिक अवस्था में ही न रोका गया तो जानलेवा साबित होता है। यह व्यक्ति को धीरे-धीरे मारता है। टी.बी. रोग को अन्य कई नाम से जाना जाता है, जैसे तपेदिक, क्षय रोग तथा यक्ष्मा। विश्व क्षय रोग दिवस के माध्यम से टी.बी. जैसी समस्या के विषय में और इससे बचने के उपायों के विषय में बात करने में मदद मिलती है।

विश्व स्वास्थ्‍य संगठन का समर्थन

विश्व क्षय रोग दिवस पूरे विश्व में 24 मार्च को घोषित किया गया है है और इसका ध्येय है लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और क्षय रोग की रोकथाम के लिए कदम उठाना। विश्व टीबी दिवस को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) जैसे संस्थानों से समर्थन मिलता है। भारत में टीबी के फैलने का एक मुख्य कारण इस बीमारी के लिए लोगों सचेत ना होना और इसे शुरूआती दौर में गंभीरता से ना लेना। टी.बी किसी को भी हो सकता है, इससे बचने के लिए कुछ सामान्य उपाय भी अपनाये जा सकते हैं।
फेफड़ों में टी.बी. का संक्रमण (एक्स-रे)

क्षय रोग


क्षय रोग या टी.बी एक संक्रामक बीमारी है, जिससे प्रति वर्ष लगभग 1.5 मिलियन लोग मौत का शिकार होते हैं। पूरे भारत में यह बीमारी बहुत ही भयावह तरीके से फैली है। क्षय रोग के इस प्रकार से विस्तार पाने का सबसे बड़ा कारण है इस बीमारी के प्रति लोगों में जानकारी का अभाव। दुनिया में छह-सात करोड़ लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं और प्रत्येक वर्ष 25 से 30 लाख लोगों की इससे मौत हो जाती है। भारत में हर तीन ‍मिनट में दो मरीज क्षयरोग के कारण दम तोड़ दे‍ते हैं। हर दिन चालीस हजार लोगों को इसका संक्रमण हो जाता है। टी.बी. रोग एक बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है। इसे फेफड़ों का रोग माना जाता है, लेकिन यह फेफड़ों से रक्त प्रवाह के साथ शरीर के अन्य भागों में भी फैल सकता है, जैसे हड्डियाँ, हड्डियों के जोड़, लिम्फ ग्रंथियाँ, आँत, मूत्र व प्रजनन तंत्र के अंग, त्वचा और मस्तिष्क के ऊपर की झिल्ली आदि। टी.बी. के जीवाणु साँस द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। किसी रोगी के खाँसने, बात करने, छींकने या थूकने के समय बलगम व थूक की बहुत ही छोटी-छोटी बूँदें हवा में फैल जाती हैं, जिनमें उपस्थित बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं और स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में साँस लेते समय प्रवेश करके रोग पैदा करते हैं। रोग से प्रभावित अंगों में छोटी-छोटी गाँठ अर्थात्‌ टयुबरकल्स बन जाते हैं। उपचार न होने पर धीरे-धीरे प्रभावित अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और यही मृत्यु का कारण हो सकता है। टी.बी. का रोग गाय में भी पाया जाता है। दूध में इसके जीवाणु निकलते हैं और बिना उबाले दूध को पीने वाले व्यक्ति रोगग्रस्त हो सकते हैं। भारत में हर साल 20 लाख लोग टीबी की चपेट में आते हैं। लगभग 5 लाख प्रतिवर्ष मर जाते हैं। भारत में टीबी के मरीजों की संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। यदि एक औसत निकालें तो दुनिया के 30 प्रतिशत टीबी रोगी भारत में पाए जाते हैं।[1]

Friday, 23 March 2018

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विश्व मौसम विज्ञान दिवस (अंग्रेज़ी: World Meteorological Day) प्रतिवर्ष 23 मार्च

विश्व मौसम विज्ञान दिवस
विश्व मौसम विज्ञान दिवस
विवरण'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की स्थापना दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
तिथि23 मार्च
स्थापनासन् 1950 में 23 मार्च के दिन संयुक्त राष्ट्र की एक इकाई के रूप में विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की स्थापना हुई थी और जिनेवा में इसका मुख्यालय खोला गया था।
उद्देश्यदेश के विभिन्न हिस्सों में बैठकें, संगोष्ठियों में मौसमविज्ञानी आपस में विचार एवं अनुभव बांटते हैं तथा इस पर चर्चा करते हैं कि इस उभरते विज्ञान के ज्ञान का न केवल भारतीयों बल्कि मानवजाति के कल्याण के लिए कैसे बेहतर उपयोग किया जाए।
संबंधित लेखविश्व जल दिवस, विश्व पर्यावरण दिवस, विश्व ओज़ोन दिवस
अन्य जानकारीविश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा वर्ष 2013 में विश्व मौसम विज्ञान दिवस का विषय था 'जीवन और संपत्ति के संरक्षण हेतु मौसम का अवलोकन'।
बाहरी कड़ियाँआधिकारिक वेबसाइट (विश्व मौसम विज्ञान संगठन)
विश्व मौसम विज्ञान दिवस (अंग्रेज़ी: World Meteorological Day) प्रतिवर्ष 23 मार्च को मनाया जाता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization, डब्ल्यूएमओ) द्वारा वर्ष 2011 में विश्व मौसम विज्ञान दिवस के अवसर पर 'जलवायु हमारे लिए' (Climate for You) विषय पर जोर दिया गया। जबकि वर्ष 2013 में इसका विषय था- जीवन और संपत्ति के संरक्षण हेतु मौसम का अवलोकन। इस दिवस पर देश के विभिन्न हिस्सों में बैठकें, संगोष्ठियां और अन्य कार्यक्रम होते हैं जिनमें मौसमविज्ञानी आपस में विचार एवं अनुभव बांटते हैं तथा इसपर चर्चा करते हैं कि इस उभरते विज्ञान के ज्ञान का न केवल भारतीयों बल्कि मानवजाति के कल्याण के लिए कैसे बेहतर उपयोग किया जाए।

विश्व मौसम संगठन की स्थापना

सन् 1950 में 23 मार्च के दिन संयुक्त राष्ट्र की एक इकाई के रूप में विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की स्थापना हुई थी और जिनेवा में इसका मुख्यालय खोला गया था। संगठन की स्थापना का उद्देश्य मानव के दुखदर्द को कम करना और संपोषणीय विकास को बढावा देना है। 
विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) का प्रतीक चिह्न
पहले के विपरीत वर्तमान में मौसम विज्ञान में केवल मौसम संबंधी विधा शामिल नहीं है बल्कि इसमें पूरा भू-विज्ञान है। इसका इस्तेमाल बाढ़, सूखा और भूकंप जैसे प्राकृतिक आपदा का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग नाविकों, समुद्री जहाजों और उन लोगों द्वारा भी किया जाता है जो सड़क एवं विमान यातायात का प्रबंधन संभालते हैं। ये सारी बातें मौसम पर्यवेक्षण टावरों, मौसम गुब्बारों, रडारों, कृत्रिम उपग्रहों, उच्च क्षमता वाले कंप्यूटरों और भिन्न-भिन्न अंकगणितीय मॉडलों से भी संभव हो पाती हैं।[1]

भारतीय मौसम और जलविज्ञान

मौसम पर्यवेक्षण के लिए अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में उपग्रह तैनात करने के अलावा भारतीय वैज्ञानिक मौसम और जलविज्ञान अध्ययन के लिए 1981 से ही अंटार्कटिका पर जाते रहे हैं। सागरीय प्रक्रियाओं को समझने के लिए और उससे प्राप्त अनुभवों का हिंद महासागर क्षेत्र के लोगों तक लाभ पहुंचाने के लिए भारत ने वैश्विक समुद्री पर्यवेक्षण तंत्र (आईओजीओओएस) के हिंद महासागर अवयव की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिलहाल वह हिंद महासागर पर एक अंतराष्ट्रीय परियोजना के साथ भी तालमेल स्थापित कर रहा है। आईओजीओओएस की भांति ही डब्ल्यूएमओ भी दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की परिघटना को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई अन्य कार्यक्रमों को प्रायोजित कर रहा है। इसके कार्यक्रमों के तीन लक्ष्य हैं-
  1. व्यवस्थित मौसम एवं जलवायु पर्यवेक्षण में सुधार और पिछली जलवायु अवधियों का पुनर्निर्माण।
  2. दीर्घकालीन जलवायु अनुमान में विद्यमान अनिश्चितता को घटाने के लिए जलवायु मॉडलों का पुनर्परिभाषित करना।
  3. यह सुनिश्चत करना कि जलवायु विज्ञान में प्रगति संपोषणीय विकास में योगदान।[1]

शहीद दिवस (अंग्रेज़ी: Martyrs' Day) भारत में 23 मार्च

शहीद दिवस
सुखदेव, भगतसिंह, राजगुरु
विवरण23 मार्च, 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेज़ी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया था। इन तीनों वीरों की शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए ही शहीद दिवस मनाया जाता है।
देशभारत
संबंधित लेखशहीद दिवस (गाँधी जी), भारतीय क्रांति दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस
अन्य जानकारीमहात्मा गाँधी की याद में भी शहीद दिवस मनाया जाता है। 30 जनवरी को सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर ‘शहीद दिवस’ मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
शहीद दिवस (अंग्रेज़ी: Martyrs' Day) भारत में 23 मार्च को मनाया जाता है। 23 मार्च, 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेज़ी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों- भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया था। शहीद दिवस के रूप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है, पर स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले यह नायक हमारे आदर्श हैं। इन तीनों वीरों की शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए ही शहीद दिवस मनाया जाता है। जबकि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की याद में भी शहीद दिवस मनाया जाता है। 30 जनवरी को सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर ‘शहीद दिवस’ मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

इतिहास

भारत एक महान् देश है। यहां का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। यह देश अपने अंदर ऐसी कई संस्कृतियां समेटे हुए है, जिसने इसे विश्व की सबसे समृद्ध संस्कृति वाला देश बनाया है। यह देश उन वीरों की कर्मभूमि भी रही है, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस देश के लिए कार्य किए हैं। अपने वतन के लिए प्राणों की बलि देने से भी हमारे वीर कभी पीछे नहीं हटे। देश को स्वतंत्र कराने के लिए देश के वीरों ने अपनी जान की आहुति तक दी। आज़ादी के बाद भी हमारे वीर सैनिकों ने सीमाओं पर हमारी हिफाजत के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगाया। अदालती आदेश के मुताबिक भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च, 1931 को फाँसी लगाई जानी थी, सुबह क़रीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च, 1931 को ही इन तीनों को देर शाम क़रीब सात बजे फाँसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातों रात ले जाकर सतलुज नदी के किनारे जला दिए गए।
अंग्रेज़ी हुकूमत ने भगतसिंह और अन्य क्रांतिकारियों की बढ़ती लोकप्रियता और 24 मार्च को होने वाले विद्रोह की वजह से 23 मार्च को ही भगतसिंह और अन्य को क्रांतिकारियों को फाँसी दे दी थी। दरअसल यह पूरी घटना भारतीय क्रांतिकारियों की अंग्रेज़ी हुकूमत को हिला देने वाली घटना की वजह से हुई। 8 अप्रैल1929 के दिन चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में ‘पब्लिक सेफ्टी’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ के विरोध में ‘सेंट्रल असेंबली’ में बम फेंका गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगतसिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात् क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।[1]

भगतसिंह

सिक्ख परिवार में पंजाब के लायलपुरमें 28 सितंबर, 1907 को जन्में भगतसिंह भारतीय इतिहास के महान् स्वतंत्रता सेनानियों में जाने जाते थे। उनके पिता गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध एक संगठन के सदस्य थे, जो भारत की आजादी के लिये काम करती थी। भगतसिंह ने अपने साथियों- राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव और जय गोपाल के साथ मिलकर लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज के खिलाफ लड़ाई की। शहीद भगतसिंह का साहसिक कार्य आज के युवाओं के लिये एक प्रेरणास्रोत का कार्य कर रहा है। वर्ष 1929 में, 8 अप्रैल को अपने साथियों के साथ केन्द्रीय विधायी सभा में "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए बम फेंक दिया था। उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ और 23 मार्च, 1931 को लाहौर के जेल में शाम 7:33 बजे फाँसी पर लटका दिया गया। उनके शरीर का दाह संस्कार सतलुज नदी के किनारे हुआ था। वर्तमान में हुसैनवाला (भारत-पाकिस्तानसीमा) में राष्ट्रीय शहीद स्मारक पर, एक बहुत बड़े शहीदी मेले का आयोजन उनके जन्म स्थान फ़िरोज़पुरमें किया जाता है।[2]

भारत में 'शहीद दिवस'

भारत में राष्ट्र के दूसरे शहीदों को सम्मान देने के लिये एक से ज्यादा शहीद दिवस, राष्ट्रीय स्तर पर इसे 'सर्वोदय दिवस' भी कहा जाता है, मनाने की घोषणा की गयी है-
13 जुलाई
22 लोगों की मृत्यु को याद करने के लिये भारत के जम्मू और कश्मीर में शहीद दिवस 13 जुलाई को भी मनाया जाता है। वर्ष 1931 में 13 जुलाई को कश्मीरके महाराजा हरिसिंह के समीप प्रदर्शन के दौरान रॉयल सैनिकों द्वारा उनको मार दिया गया था।
17 नवंबर
लाला लाजपत राय (पंजाब के शेर के नाम से मशहूर) की पुण्यतिथि को मनाने के लिये उड़ीसा में शहीद दिवस 17 नवंबर के दिन मनाया जाता है। वे ब्रिटिश राज से भारत की आजादी के दौरान के एक महान् नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे।

शहीद दिवस (गाँधी जी)


बापू की याद में भी शहीद दिवस मनाया जाता है। 30 जनवरी को सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधीकी पुण्यतिथि पर ‘शहीद दिवस’ मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। इस दिन सुबह 11 बजे दो मिनट का मौन रखा जाता है। उनके स्मारक को फूलों से सजाया जाता है। देश के गणमान्य व्यक्ति दिल्ली के राजघाट पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। इस दिन सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं और बापू के प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजा राम,’ और ‘वैष्णव जन’ गाए जाते हैं। शाम के समय उनका स्मारक मोमबत्तियों से प्रकाशित किया जाता है।[3]

ચાલો કરીએ ઇતિહાસની રોમાંચક સફર આપણા વર્ગખંડમાં

સરેરાસ માણસ માટે ઈતિહાસ એ કંટાળાજનક  આવતો હોય છે પરંતુ ખરેખર ઈતિહાસ એ ખુબજ રોમાંચક વિષય છે.જો ઈતિહાસ ને યોગ્ય રીતે રજૂઆત કરવામાં આવે અને તેને બીજી સાંપ્રત ઘટનાઓ જોડે અનુબંધ કરવામાં આવે તો ઈતિહાસ ભણવો અને ભણાવવો ખુબ જ સહેલો અને રસપ્રદ બની જાય છે.મિત્રો અહી વિજ્ઞાન ની જગ્યાએ આજે ઈતિહાસ વિષય  કેમ પસંદ કર્યો તેવું મનમાં થતું હશે પણ એવું નથી   કેમ કે અહી વાત તો અંતે  વિજ્ઞાન અને ટેકનોલોજીની જ આવે છે કે જેના થકી આ શક્ય બન્યું છે.

મોટા ભાગે એવું માનવામાં આવતું હોય છે કે ઈતિહાસ એટલે ભૂતકાળમાં બનેલી  ઘટનાઓનો સમૂહ.વાત સાચી પણ આ વાત થોડી અધુરી પણ કહેવાય અને એટલે જ મોટા ભાગે ઈતિહાસ કંટાળાજનક લાગતો હોય છે.આપણને મોટા ભાગે ઇતિહાસની  ઘટનાઓ જ યાદ હોય છે પણ તેની સમાંતર બીજી અનેક નાની મોટી ઘટનાઓ ઘટી હોય છે જેના વિષે આપણને બહુ ઓછી માહિતી હોય છે.પણ જો આ દરેક નાની ઘટનાને પણ મુખ્ય ઘટના જોડે જોડવામાં  આવે તો ઈતિહાસ  ખરેખર રસપ્રદ બની જાય.પરંતુ અહી તકલીફ એ છે કે વર્ગખંડ માં કોઈ પાઠ ભણાવતી વખતે આપણે મુખ્ય ઘટના વિષે  જાણતા હોઇએ અને બીજી નાની ઘટનાઓ ની માહિતી ના હોય એવું બનતું હોય છે.આવા સમયે આપણે લાયબ્રેરી માંથી સંદર્ભ પુસ્તકો ના સહારે થોડી માહિતી એકઠી કરવાનો પ્રયાસ કરીએ છીએ પરંતુ આવા  સમયે લાયબ્રેરીમાંથી પણ આપણને જોઈતી માહિતી પૂરતા પ્રમાણમાં ઉપલબ્ધ થતી હોતી નથી.

અહી બીજો પણ એક બેસ્ટ ઉપાય છે કે આપણે શાળાની નજીકના કોઈ મ્યુઝીયમ ની મુલાકાત લઇ શકીએ અને આવા બીજા સંગ્રહાલય નો પણ સંદર્ભ તરીકે સમાવેશ કરી શકીએ.પરંતુ અહી મોટી તકલીફ જ એ હોય છે કે દરેક શાળાની નજીકમાં આવા મ્યુઝીયમ હોતા નથી અને દરેક વખતે આવા મ્યુઝીયમની મુલાકાત પણ શક્ય હોતી નથી.
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મિત્રો વિચારો કે આવા સમયે આપણે આપણા વર્ગખંડ ને જ જો એક નાનકડું હંગામી મ્યુઝીયમ બનાવી દઈએ તો?અહી હવે જ ખરા વિજ્ઞાન અને ટેકનોલોજીની વાત શરુ થાય છે.આજના યુગ માં બધું જ શક્ય છે.બસ થોડું વિચારવાનું અને ઈન્ટરનેટ પર ખાંખા ખોળા કરવાનું ચાલુ રાખવું પડે.ઇતિહાસના કોઈ પાઠમાં જયારે કોઈ મુખ્ય ઘટના ભણાવવાની આવે ત્યારે તેની સાથે બીજી નાની ઘટનાઓ ની માહિતી સરસ મજાના ઐતિહાસિક ફોટાઓ સાથે ઢગલાબંધ પ્રાપ્ત થાય તો? અને આ બધા જ ફોટાઓ વિશ્વના પ્રખ્યાત મ્યુઝીયમ માંથી લીધેલ હોય તો?તો તો ખરેખર ઈતિહાસ રોમાંચક જ બની જાય.

મિત્રો અહી નીચે અમુક મુખ્ય ઘટનાઓ ની નામાવલી આપવામાં આવી છે જેના પર ક્લિક કરશો એટલે તેની સાથે બનેલી તમામ નાની મોટી ઘટનાઓ ની માહિતી ફોટાઓ સાથે તમે મેળવી શકશો.અહી તમામ ફોટાઓનો સ્ત્રોત વિશ્વના પ્રખ્યાત મ્યુઝીયમોનો છે અહી માહિતી જોકે અંગ્રેજી ભાષામાં છે પણ તમે ફોટા સાથે તેનો અનુબંધ કરશો એટલે તે સમજવામાં બહુ મુશ્કેલી નહિ પડે.

તો તૈયાર થઇ જાઓ ઈતિહાસ ની રોમાંચક સફર માટે 

1-ભારતીય બંધારણ ની મુખ્ય ઘટનાઓ

2-ભારતની સ્વતંત્રતા નો પહેલો દિવસ-1947

3-નાગાસાકી પર અણુબોમ્બ હુમલો-1945 

4-હિરોસીમા પર અણુબોમ્બ હુમલો-1945

5-બર્લિન ક્રાંતિ-1989

6-પ્રથમ વિશ્વ યુદ્ધ

મિત્રો આટલી માહિતી પછી ઈતિહાસ ને હજુ વધુ રોમાંચક બનાવવો હોય તો નીચે આપેલ યાદી ને પણ ચેક કરજો કેમકે તે માત્ર  યાદી જ નથી પણ જે તે નામ પર  ક્લિક કરવાથી તમે તુરંત જ જે તે સ્થળ પર પહોંચી જશો.વર્ગખંડ માં હોવા છતાં પણ ત્યાના રૂબરૂ દર્શન કરી શકશો અને ઈતિહાસ ના સાક્ષી એવા સ્થળને વધુ નજીકથી જોઈ શકશો.સ્ક્રીન પર માઉસ ને ફરતી તરફ ઘુમાવી બધો જ નજરો માણજો 

1- ગેટવે ઓફ ઇન્ડિયા

2-તાજમહેલ 

3-ગિઝા ના પિરામીડ

4-મોનસેરેટ પેલેસ-લંડન 

5-અંગકોરવાટ-કંબોડિયા 

6-સાઈન નદીનો કિનારો-પેરીસ

7-રાજગઢ-મહારાષ્ટ્ર 

8-ગ્રાન્ડ કેન્યન-અમેરિકા 

9-એન્ટાર્કટીકા

10-હિરોસીમા શાંતિ મેમોરીયલ 

11-પિઝાનો ઢળતો મિનારો 

મીત્રો ઉપર  આપેલ માહિતી આપને ઇતિહાસ અને સાથે સાથે ભૂગોળ વિષય ના અનુબંધ માટે ઉપયોગ  માં આવશે.શરૂઆત માં કહ્યું તેમ ઈતિહાસ ભણવાની અને ભણાવવાની મજા ત્યારે જ આવે જયારે તેનો અનુબંધ બીજા વિષય અને ઘટનાઓ સાથે કરવામાં આવે અને આ અનુબંધ કરવાનું કામ વિજ્ઞાન અને ટેકનોલોજી કરે છે જે આપણા બ્લોગની મુખ્ય થીમ છે.


આભાર = વિશાલ વિજ્ઞાન